कुछ मुसलमान मानते हैं कि भाग्य तो पहले से लिखा हुआ है। अगर ऐसा है तो फिर कुछ लोग उन कर्मों (अमाल) के लिए नरक में क्यों जायेंगे जो उनकी किस्मत में पहले से लिखे हुए थे ? इस बारे में तो वह कुछ नहीं कर सकते। इसके अलावा यह बात भी आती है कि अगर पूर्व निर्धारित (पहले से तय) भाग्य बदला नहीं जा सकता तो फिर ऐसे में प्रार्थना और दुआ का क्या मकसद रह जाता है ?

इस संबंध में, अगर निम्नलिखित स्पष्टीकरण (वज़ाहत) को ध्यान में रखें, तो किस्मत और पूर्वनियति को लेकर आमतौर जो उलझन और भ्रम पाया जाता है उसको दूर करने में काफी मदद मिल सकती है:

1. अच्छाई और बुराई के बीच चुनने के लिए अल्लाह ने हमें स्वतंत्र इच्छा दी है। इंसान को इरादे और इख़्तियार की पूरी आज़ादी है। अगर कोई व्यक्ति सही रास्ता चुनने का इरादा करता है तो यह पूरी तरह उसी का फैसला है, और अगर वह गलत रास्ता चुनने का इरादा करता है तो यह भी पूरी तरह उसी का फैसला है। हमें दी गयी इरादे और इख़्तियार में आज़ादी की इस छूट के बाद अल्लाह हमें जज़ा (इनाम) या सज़ा देगा। इसलिए यह प्रतिफल (बदला) पूरी तरह से हमारे कर्मों के आधार (बुनियाद) पर ही मिलेगा किस्मत के हाथों मजबूरी में नहीं।

2. जो कुछ हमारी किस्मत में लिखा है उससे मुराद असल में अल्लाह का हमारी किस्मत के बारे में ज्ञान (इल्म) है। अल्लाह को पहले से ज्ञान होने का मतलब यह बिलकुल नहीं है कि हम वह करने के लिए मजबूर हैं जो कुछ पहले से लिखा हुआ हैं। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि वह जानता है कि हम क्या करेंगे और क्या फैसले लेंगे। यानी अल्लाह अगर यह जानता है कि कौन नरक में जायेगा और कौन स्वर्ग में तो इसका अर्थ सिर्फ यह है कि वह लोग कर्म इस तरह के करेंगे जिसका नतीजा यही होना है। दूसरे शब्दों में कहें तो व्यक्ति के कर्म पर ही उसके भाग्य का फैसला होगा। हालांकि, वह जो भी रास्ता वह चुनेगा और जो भी कर्म करेगा यह अल्लाह के ज्ञान में ज़रूर है।

3. प्रार्थना और दुआ बड़ा महत्व (अहमियत) रखती है क्योंकि यह तौहीद (एकेश्वरवाद) की अभिव्यक्ति (इज़हार) है। इस के बारे में भी यह समझ लेना चाहिए कि कुछ चीज़ें तो अल्लाह ने हमारे बारे में तय कर रखी हैं वह उसी तरह मिलेंगी, उदाहरण के तौर पर कौन कहाँ पैदा होगा यह तो पहले से तय है, और कुछ चीज़ों के बारे में यह तय कर रखा है कि अगर बंदा मांगेगा तो दे दिया जायेगा, अन्यथा (वरना) नहीं दिया जायेगा। दूसरे शब्दों में कहें यह दुआ पर निर्भर हैं, इसलिए व्यक्ति को दुआ की उपेक्षा (नज़रअंदाज़) नहीं करनी चाहिए।

– शेहज़ाद सलीम
  अनुवाद: मुहम्मद असजद​​

 

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